अयोध्या ढांचा विध्वंस केस: हालात बिगड़ने की आशंका को लेकर लगाना पड़ा था कर्फ़्यू

लखनऊ: यह बात है छह दिसंबर,1992 की जब अयोध्या विवादित ढांचा विध्वंस की घटना के वजह से जो हिंसा अयोध्या में भड़की थी उसकी आग लखनऊ तक पहुंच चुकी थी। 

लखनऊ पुलिस को इस बात की आशंका थी कि दंगे की आग और ज्यादा भड़क सकती है। इस बात के मद्देनजर  प्रशासन ने वहां के सात थानों में  कर्फ्यू लगा दिया था। प्रशासन को जहां सबसे ज्यादा हिंसा होने की आशंका थी उन जगहों में चौक, अमीनाबाद, सहादतगंज, ठाकुरगंज, वजीरगंज, बाजारखाला एवं कैसरबाग शामिल थे। हालांकि इन जगहों पर डीएम व एसएसपी ने शख्ति तो बढ़ा दी थी मगर इसके बावजूद थोड़े थोड़े वक्त के अंतराल पर यहाँ कोई न कोई हिंसक घटना घट ही रही थी।

उस दिन लखनऊ शहर की शांति बनाए रखने में पुलिस के हाथ पांव फूल गए थे। हालात ऐसे थे कि कहीं छत पर खड़े होकर लोगों द्वारा नारेबाजी की जा रही थी तो कहीं घरों से निकलकर लोग पत्थराव तथा फायरिंग तक पे उतर आए थे। परिस्थिति ऐसी बन गई थी कि जब वह किसी एक जगह पर हालात को नियंत्रित करने की कोशिश ही कर रहे होते थे कि तब तक किसी दूसरी जगह से हिंसा की आग तेज होने की खबर आ जाती।

हालात बद से बदतर तब हो गए जब नक्खाश सब्जी मंडी में जो प्रदर्शन नारेबाजी के साथ शुरू हुआ था वह  एक दूसरे पर पथराव करने में तब्दील हो गया। जिस वजह से लोगों के घायल होने के साथ-साथ गाड़ियां भी क्षतिग्रस्त हो गई। हिंसक भरी यह घटना यहां पर ही नहीं थमी। कहीं दुकानों के शटर गिरा दिए जा रहे थे तो कहीं भगदड़ की स्थिति बन रही थी।

यह सारा मामला अभी ठंडा पडा भी नहीं था कि तब तक किसी ने अकबरी गेट के पास स्थित पान की दुकानों में आग लगा दी। इतना ही नहीं सआदतगंज में जहां दो पक्षों के बीच पथराव की स्थिति बनी हुई थी वहीं नक्कास चौकी के पीछे कुछ समय बाद लोगों के बीच एक दूसरे पर चाकू छुरी चलाने की घटना के घटित होने की खबर आने लगी थी।

तभी नेहरू क्रास इलाके में  कुछ युवक एक वर्ग के लोगों के घर का दरवाजा तोड़ रहे थे। हालांकि उनमें से दो युवकों को पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार कर लिया था।

अभी पुलिस द्वारा इन सभी घटनाओं पर काबू पाया भी नहीं गया था कि तब तक उनके वायरलेस रिसिवर में सूचना आती है की बजाजा, हुसैनाबाद, महिला कॉलेज इलाके में भारी मात्रा में लोगों द्वारा सड़क पर उतर कर नारेबाजी कि जा रही हैं। जैसे ही पुलिस की एक टुकड़ी उस इलाके में हालात को नियंत्रण करने के मकसद हेतु रवाना हुई तब तक बिलोचपुरा और अशर्फाबाद के साथ-साथ कश्मीरी मोहल्ला इलाके से तनाव बढ़ने की सूचना आती है। उस वक्त पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार वहां के स्थानीय लोग नारेबाजी के साथ-साथ फायरिंग भी कर रहे थे। 

अभी इन सारे  परिस्थिति से पुलिस निपट ही रही थी कि तब तक करीब रात के 11:30 बजे पुलिस के पास एक और सूचना आई। उसमें यह बताया गया कि मछली मोहाल, घसियारी मंडी एंव नजरबाग इलाके में लोगों द्वारा जोर शोर से नारेबाजी की जा रही है।

उस दिन हालात को नियंत्रित करने हेतु देर रात तक तत्कालीन डीएम अशोक प्रियदर्शी एंव एसएसपी समाल पूरी टीम समेत पुराने लखनऊ में गश्त करते रहे।

इन सभी हिंसा की घटनाओं पर काबू तब पाया गया जब पुलिस की कई टीमों को इन इलाकों में तैनात किया गया। 

 

परिचय पत्र को कर्फ्यू पास  बना किया जा रहा था इस्तेमाल

उन दिनों अधिकारियों के परिचय पत्र को कर्फ्यू पास के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था। उस वक्त के तत्कालीन डीएम अशोक प्रियदर्शी ने केंद्र एवं राज्य सरकार के सभी कर्मचारियों के लिए उनके विभाग से उन्हें दी गई पहचान पत्र को कर्फ्यू पास के तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी थी। यहां तक की उस वक्त पत्रकारों को भी जो प्रेस कार्ड उपलब्ध कराया जाता था, उन्हें भी उन प्रेस कार्ड को कर्फ्यू पास के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई थी। 

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