आईआईटी से पढ़ने के पश्चात छोड़ी 22 लाख की नौकरी और गांव में कुछ नया करने की ठानी।

आईआईटी से पढ़ने के पश्चात छोड़ी 22  लाख की नौकरी और गांव में कुछ नया करने की ठानी।

 

 

 

बिहार,( कुलसूम फात्मा )   आज भी शहर में जाकर शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात लोग अपने गांव को नहीं भूलते हैं और गांव के विकास के लिए कुछ करने का जज्बा उनमें रहता है। जिसे वह वापस आकर के गांव में पूरा करते हैं, उनमें से एक पूजा भारत भी है। पूजा भारत की बड़ी सरकारी कंपनी में नौकरी लग गई थी।

पूजा भारत उस कंपनी में नौकरी तो कर रही थी परंतु जब गांव की याद आती थी तो उसका मन मुरझा जाता था   पूजा भारत नालंदा जिले के बिहार शरीफ की रहने वाली हैं और एक होनहार छात्रा भी रही है 2005 में इन्होंने आईआईटी की परीक्षा पूर्व करने के पश्चात 2009 में केमिकल इंजीनियरिंग में ग्रैजुएट करा है इनकी नौकरी GAIL नाम की कंपनी में लग गई थी।

परंतु जब इनको अपना गांव याद आता था तो बहुत ही यह निराश हो जाती थी इनको बगीचे बहुत पसंद थे शहर की नौकरी में उन्हें पैसा तो मिल रहा था पर दिली सुकून नहीं प्राप्त हो पा रहा था।

वहीं दूसरी ओर आईआईटी में पूजा के बैचमेट रहे मनीष ने पास आउट होने के पश्चात नौकरी करने के बजाय उन्होंने बिहार लौट कर खेती करना प्रारंभ कर दिया था। मनीष गांव के लोगों के लिए कुछ करना चाहता था। और वह बेरोजगारी से भी काफी दुखी था। साथ ही पूजा को जब भी मौका मिलता और जब वह प्रकृति के नज़दीक जाना चाहती तो गांव चली आती थी वह मनीष से ऑर्गेनिक खेती के बारे में भी यहां पर बात चीत करती वह कई ऐसे

गई जहां पर देखा के किसान ऑर्गेनिक की खेती कर रहे हैं। पूजा ने देखा तो उन पर इसका असर पड़ा और वह बताती हैं कि मैं और मनीष खेती को लेकर के बातचीत तो क्या करते थे। मुझे यह भी एहसास हुआ। वहां पर जाकर के कि कृषि क्षेत्र में ऐसे लोगों की बहुत ही ज्यादा आवश्यकता है जो सोच समझकर खेती कर रहे हो क्योंकि खेती से ज्यादातर वही लोग करते हैं, जिनके पास न नौकरी होती है न अपना कारोबार वह बताती हैं कि उन्होंने 2015 में जब जॉब को छोड़ दिया था तो उसके पश्चात अगले एक ही वर्ष तक जैविक कृषि के बारे में सीखना प्रारंभ कर दिया था ,

 

वह बताती हैं की इसमें दीपक सचदे ने मेरी सहायता बहुत करी है जो कि मेरे गुरु रहे हैं। पिछले वर्ष अक्टूबर के माह में उनकी मृत्यु भी हो गई। उनसे जब मैं मिली तो उनसे मिलने के पश्चात ऑर्गेनिक फार्मिंग पर मेरा यकीन बहुत ज्यादा बढ़ गया था। मुझे लगने लगा था कि खेती का उचित समय और तरीका यही है।

वह बताती हैं की 2016 में हमने बैक टु विलेज प्रारंभ किया। इनका मकसद जैविक खेती करना नहीं था बल्कि रोजगार भी प्रदान करना था। पूजा और मनीष ने सर्वप्रथम उड़ीसा में काम करना प्रारंभ कर दिया। शुरुआत में प्रारंभिक समय में सिर्फ वे दोनों ही एक साथ थे, परंतु जब एक डेढ़ वर्ष तक बीच बीच वह गांव जाते और किसानों को हो रही परेशानियों को भी समझाते तो किसान खुश हो जाते थे जो दिक्कतें आती उसका मसला हल करते धीरे-धीरे लोगों ने टीम का रूप ले लिया और कार्य को गति मिली ।

पूजा बताती हैं कि जब मैंने जॉब ज्वाइन की थी तब पर भी मेरा दिल करता था मैं खेती करूं और जॉब छोड़ने के पश्चात मेरा मकसद पूरी तरीके से खेती बन गया था। जब मैंने नौकरी छोड़ी थी तब मेरा पैकेज केवल 22 लाख के करीब था। अगर मैं नौकरी करती तो अभी मेरा वेतन बस सालाना 33 लाख ही होता। कहती हैं की खेती करके मैं इतना नहीं कमा पा रही हूं, परंतु पहले से अधिक वर्तमान समय में , मैं  खुश  हूं।

वह कहती हैं कि मेरी जिंदगी से लोगों को रोजगार मिल रहा है। मेरे वजह से लोग खुश हैं। इससे ज्यादा मेरी जिंदगी में खुशियां क्या आ सकती है ?

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