इस करोना में ना जाने कितने लोगों की नौकरी गई वही उत्तर प्रदेश के 450 संविदा कोच चाट और चाय बेचकर चला रहे हैं अपने घर गृहस्ती का जीवन। 

इस करोना में ना जाने कितने लोगों की नौकरी गई वही उत्तर प्रदेश के 450 संविदा कोच चाट और चाय बेचकर चला रहे हैं अपने घर गृहस्ती का जीवन। 

लखनऊ वैश्विक महामारी। इस महामारी कोरोनावायरस ने ना जाने कितने घरों को तोड़ा है। 

कोरोनावायरस  कितने की नौकरियां खाई है। 

और लगातार खाई जा रही है कोरोनावायरस के इस माहौल के दौर में उत्तर प्रदेश में विभिन्न खेलों का संचालक करने वाले तकरीबन साडे 400 से ऊपर संविदा की कोच की हालत लगातार खराब होती जा रही है।

आप कह सकते हैं कि उनकी हालत माली जैसी है वे लगभग 5 माह से अपने वेतन की जद्दोजहद कर रहे हैं और उनको वेतन नहीं मिल पा रहा है जिस वजह से इन लोगों की  घर की स्थिति बहुत ही खराब हो चुकी है इसी से अंदाजा आप लगा सकते हैं कि इन साडे 400 संविदा कोच के कुछ ऐसे भी कर्मचारी हैं।

जिनको परिवार चलाने के लिए उन्हें चाट  की रेडी लगाने से लेकर निजी स्टोर पर सुपरवाइजर और चाय की दुकान तक जलाने का काम करना पड़ रहा है।

 

प्रदेश में नियमित पर शिक्षकों की संख्या सिर्फ डेढ़ सौ के आसपास है खिलाड़ियों के लिए आगे क्यों नहीं आ रहे हैं लोग इन कोच के ऊपर इन खिलाड़ियों को निखारने की जिम्मेदारी संविदा प्रशिक्षक पर अधिक है।

ऐसे में सवाल यह है कि खेल विभाग इनकी मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। 

हालांकि उत्तर प्रदेश के ओलंपिक एसोसिएशन की अगुवाई में तमाम खेल संघों ने उन्हें शासन से ₹5000 प्रति माह वेतन देने की गुहार लगाई है लेकिन  लेकिन संबंधित विभाग की उदासीनता के चलते इस पर भी अभी तक कोई फैसला नहीं हो सका हैजिससे संविदा के कुछ कर्मचारी काफी परेशान हैं और विचलित है।

आखिरकार क्यों ना हो हर किसी को अपनी अपनी जिम्मेदारी होती है गृहस्ती होती है उनको घर चलाना होता है सारा दारोमदार उनके सर पर ही है।

जिस वजह से संविदा के कोच काफी परेशान है और सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि उनके ऊपर भी नजर दिया जाए उसे इस कदर नजरअंदाज ना किया जाए। 

 शनीष मणि मिश्रा  को कौन नहीं जानता। 

मिश्रा अंतरराष्ट्रीय सॉफ्ट टेनिस खिलाड़ी हैं और लक्ष्मण अवार्ड मनीष मनीष मणि मिश्रा पिछले 3 वर्षो से खेल विभाग में संविदा पर शिक्षक के पद पर तैनात थे मिक्सड डबल्स में देश के लिए स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।

अनीश की जिंदगी बहुत अच्छी चल रही थी पर कोरोनावायरस में इनको भी अपनी चपेट में लेते हुए इनकी माली हालत बद से बदतर कर दी लोटन के सबसे ज्यादा हम बर्बाद आम लोगों को किया गया है।

उसी में से एक हमारे शनिस मिश्रा जी  कोविड-19 बेहाल करके रखा हुआ है बताते हैं मुझे विभाग से लगभग ₹27000 मिलते थे इसमें ₹10000 प्रतिमाह घर पर भेजता था लेकिन मार्च के बाद सैलरी तो छोड़िए एक भी पैसे की मदद नहीं मिली इस संबंध में खेल निर्देशक डॉक्टर आरपी सिंह  से कई बार  मिल चुका हूं।

लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला मदद नहीं मिल पाई सनी इन दिनों शहर के एक निजी स्टोर में सुपरवाइजर की नौकरी कर रहे हैं।

वह बताते हैं कि इस नौकरी से जितना पैसा मिलता है उतने में अपना ही खर्च चलता है पिछले 5 महीने से घर पर एक भी पैसा नहीं भेज पाया हूं और हर बार मां पूछती है कि सैलरी का कुछ हुआ पर मेरा जवाब मां को सांत्वना देने वाला होता है कि जल्द सब ठीक हो जाएगा मैं सब कर दूंगा माँ सब ठीक होगा। 

 

यही हाल हमारे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी शत्रुघ्न लाल की भी है। 

लाल अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी शहर के चौक स्टेडियम में संविदा कुछ है। उनके ऊपर हमारे बच्चों की भविष्य अटकी हुई है उन्हें जिम्मेदारियां दी गई थी कि इन बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय लेवल की खिलाड़ी बनाया जाए जिससे या बच्चे आगे जाकर हमारे देश का नाम रोशन कर सकें शत्रुघ्न जी अपना काम तो बिल्कुल बखूबी से निभा रहे थे लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते उन्हें घर पर बैठना पड़ा ऐसे में बच्चों की पढ़ाई तो दूर 2 जून की रोटी के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है शत्रुघ्न बताते हैं 5 महीने से सैलरी नहीं मिली है अब तो मेरे बच्चों की भविष्य भी दांव पर लगता दिख रहा है जिससे हमारे बच्चों के साथ और हमारी चिंता लगातार बढ़ रही है जिसे कोई देखने वाला और सुनने वाला नहीं है इस संबंध में कई बार खिलवा कब चक्कर भी लगा चुका हूं लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता और और शत्रुघ्न ने इस बाग में किराए की दुकान लेकर अपने परिजनों के साथ चाट की दुकान इस उम्मीद से खुली कि शायद हालात कुछ बेहतर हो जाए लेकिन किस्मत ना यहां भी धोखा दिया वह बताते हैं कि कुरान से ग्राहक को भी टोटा है और हमारे पास ग्राहक नहीं आते इस वजह से हमारे या चार्ट गिरिडीह भी बहुत काम नहीं कर पा रही जिससे आमदनी हो पाए और अपने परिवार का रोज़मर्रा की ज़रूरतों का भरपाई  कर पाए। 

 

आपने मुक्केबाज मोहम्मद नसीम का नाम तो सुना ही होगा। 

उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय लेवल के मोहम्मद नसीम स्तर की टीम से अपने पंच का जौहर दिखा चुके हैं मुक्केबाज मोहम्मद नसीम ने इन दिनों बेरोजगार बैठे हुए हैं घर पर कोरोनावायरस काल के पहले शहर के चौक स्टेडियम में व संविदा पर मुक्केबाजी कोच की भूमिका निभा रहे थे लेकिन इस महामारी कोरोनावायरस ने इस कदर दायरा बढ़ा कि उसकी जब से वह भी नहीं बच सके ऐसे बच्चों की पढ़ाई और परिवार का खर्च चलाने के लिए नसीब को चाय की दुकान  खोलने पर सोचना पड़ा और चाय की दुकान उन्होंने खोल ली हमारे से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि जब किसी नौकरी पेशा व्यक्ति को एक महीने की सैलरी नहीं मिलती तो घर के हिसाब-किताब खराब हो जाता है।

हम लोगों के 5 महीने से एक पैसा नहीं मिला सूची हमारी परिवार का क्या बीत रहा होगा वैसा ना होने की वजह से कोई व्यापार तो कर नहीं सकता इसलिए चाय की दुकान खोली विभागीय कार्यालय में जाकर कई बार हाजिरी लगाई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही इस वजह से हम लोग परेशान हैं और कोई रास्ता दिखता नहीं जिस वजह से हमें मजबूरन चाय की रेडी लगानी पड़ रही है। 

 

 

स्पर्श  स्पोर्ट्स फाउंडेशन।  के अध्यक्ष अजीत वर्मा ने कहा सरकार ओलंपिक बहुत सारे पदक जीतने और खिलाड़ियों को ओलंपिक के लिए तैयार करने का दावा करती है। 

ऐसे में खिलाड़ियों का मनोबल कहां रहेगा और वह किस से सीखेंगे जब हमारे प्रशिक्षक ही उन्हें  शिक्षा नहीं दे पाएंगे तो किस स्तर पर तैयारी कर सकते हैं। 

खिलाड़ियों को ओलंपिक के लिए तैयार करने का दावा करती है ऐसे खिलाड़ियों को कोचिंग देने वाले कोचों को ही वेतन ना मिलना बहुत ही निराशाजनक है।

सरकार के कोचों के परिजनों के बारे में भी सोचना चाहिए वेतन ना मिलने से उनके परिवारों का भरण पोषण का भी संकट होता है।

आखिरकार वह अपने परिवार को किस तरह से चलाएंगे और संभालेंगे इसलिए जल्द से जल्द इन कोचों को भी इनकी सैलरी का प्रबंध करना चाहिए सरकार को और इनकी 5 माह से रुके हुए वेतन का भरपाई करना चाहिए जिससे यह अपने परिवार का भरण पोषण कर सके।

और हमारे देश के लिए कई युवा शक्ति युवा खिलाड़ियों को तैयार कर स्वर्ण पदक और बहुत सारी ख्याति प्राप्त कर सकें इस तरह से तैयार किया जाए जा सके तो इसलिए इनको सही समय पर वेतन दिया जाए तथा इनके लिए भी कुछ पॉलिसी तैयार की जाए। 

 

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