गार्ड को ठोकर खाता देख प्रोजेक्ट मैनेजर ने छोड़ी कंपनी और चल दिए अपनी सर जमीन से पैसा कमाने के लिए।

गार्ड को ठोकर खाता देख प्रोजेक्ट मैनेजर ने छोड़ी कंपनी और चल दिए अपनी सर जमीन से पैसा कमाने के लिए।

 

 

औरंगाबाद ,( कुलसूम फ़ात्मा )     नहीं पता इंसान की किस्मत कब किसको कहां ले जाए कभी-कभी हम दूसरों को जमीन पर देखकर आसमान पर उड़ान भरने की चाहत कर लेते हैं। परंतु यहां कुछ उल्टा ही हुआ मुंबई में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर काम कर रहे अभिषेक कुमार ने उसी कंपनी में कार्य कर रहे एक गार्ड को देखा जिस से बातचीत के बाद पता चला की वह गांव से मुंबई रोजी-रोटी की तलाश में आया था। और यहां उसे गार्ड का कार्य करना पड़ा ।
उसने बताया कि उसके पास जमीन भी है। लेकिन जमीनों से उतना लाभ प्राप्त ना होने के कारण वह जीवका चलाने के लिए यहाँ आ गया, गांव से सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पर आ कर के परिवार को खिलाने की जिम्मेदारी पूरी कर रहा हूँ और यहां पर ठोकरे खा रहा है।

कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर का कार्य कर रहे अभिषेक कुमार ने उसकी यह बातें सुनकर काफी अफसोस जताया और वह चिंतित हुआ। सोचने लगा कि ऐसे लोगों के लिए हम क्या करें जिसके कारण गांव से लोग आकर दूसरे शहरों में ठोकरे ना खाएं।
गांवों में लोगों के पास जमीन होने के बावजूद भी जमीन से लाभ उतना ना मिलने के कारण जिससे कि जीवन एक अच्छा बिताया जा सके। लोग दूसरे शहरों में ठोकरें खाते हैं। उसने यह सब बातें सोच कर के कुछ करने की ठानी। और अपनी अच्छी खासी सैलरी को छोड़ कर के वह गांव की तरफ चल पड़ा।

 

औरंगाबाद में स्थिति बरौली गांव के अभिषेक कुमार जो कि एक मल्टीनेशनल कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्य कर रहे थे। जिसकी अच्छी खासी सैलरी भी थी। परंतु सब छोड़-छाड़ यह 2011 में अपने गांव की तरफ चल दिए।
अभिषेक कुमार जिनकी उम्र तकरीबन 33 साल है इनकी पढ़ाई नेतरहाट स्कूल में हुई। उसके पश्चात इन्होंने पुणे से एमबीए किया। फिर 2007 में एचडीएफसी बैंक में नौकरी कि यहां इन्होंने 2 वर्ष तक कार्य किया। इसके पश्चात यह मुंबई गए और उन्होंने एक टूरिज्म कंपनी में 11लाख रूपए के पैकेज पर प्रोजेक्ट मैनेजर का पद संभाला और तकरीबन 1 साल तक यहां भी इन्होंने कार्य किया, यह अपने कंपनी से प्रोजेक्ट मैनेजर का पद ज्वाइन करके काफी खुश थे और फिर अपने ही वतन की सरजमीन से अमीर बनने की इन्होने ठानी।

 

यह 2011 में अपने गांव आ गए। उसके पश्चात इन्होंने घरवालों को खेती करने के बारे में बताया। घर परिवार वालों ने इसका हमेशा सबके परिवार की तरह विरोध किया। और आस पड़ोस के लोगों ने भी इनका काफी मजाक उड़ाया की इतनी अच्छी नौकरी छोड़ कर के गांव में खेती करने चले आए। परंतु यह अपने मकसद से जरा से भी ना डगमगाए और अपने पिता से एक मौका मांगा।
तत्पश्चात यह अपनी 1 एकड़ जमीन पर खेती करने के इरादे से लग गए।
क्योंकि यह एक गांव के रहने वाले थे और इनका फैमिली बैकग्राउंड भी खेती ही करने वाला है तो इनको इस कार्य करने में काफी सहायता मिली जो चीजें इनको ना पता थी वह इन्होंने गूगल से जानकारी ली।

प्रथम बार में इन्होंने एक लाख की लागत लगाई और जरबेरा फूल लगाए और पहले ही साल लाभ साडे़ 4 लाख का हुआ इसके पश्चात इन्होंने लेमन ग्रास, मशरूम, सब्जियां, रजनीगंधा, गेहूं ऐसी कई फसलों की खेती करना प्रारंभ कर दी।
इस तरह से दिन पर दिन इनको लाभ मिलता गया और इन्होंने 500 से अधिक लोगों को रोजगार भी प्रदान करा।

 

अभिषेक का उन्नति का सफर इतना आसान नहीं रहा  –

 

बीच में 2011 में इनका एक्सीडेंट हुआ जिसके कारण यह बैसाखी के सहारे भी चले।
वह कहते हैं कि मेरी उन्नत की वजह वह गार्ड बना
उसकी बातों ने मुझे अपने ही वतन से अमीर बनने के लिए मजबूर कर दिया था।
अभिषेक को 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की तरफ से सम्मानित भी किया गया है। बिहार सरकार की तरफ से भी इन्हें सम्मिलित किया जा चुका है। उन्होंने तेतर नाम से एक ग्रीन टी की किस्म तैयार की है जिसका पेटेंट उनके नाम पर ही है। इस चाय की डिमांड बहुत ज्यादा है। पूरे भारत में इसके ग्राहक भी हैं।

इन्होंने खेती के कुछ टिप्स दिए-

 

जिसमें बताया कि रजनीगंधा की खेती काफी फायदेमंद है। रजनीगंधा कि पूरे देश में भी काफी मांग है। एक हेक्टेयर में रजनीगंधा फूल की खेती करने में रकम तकरीबन डेढ़ लाख रुपए तक लग जाती है और इससे फायदा 5 लाख तक होता है।
बताया कि खेती करने के लिए सर्वप्रथम जमीन कैसी है, यह जानना चाहिए और मौसम के अनुसार ही खेती करनी चाहिए।

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