मैसूर दशहरे के मेले में होता था 10 लाख का मजमा, परंतु 300 लोग कोविड-19 के कारण होंगे शामिल।

मैसूर दशहरे के मेले में होता था 10 लाख का मजमा, परंतु 300 लोग कोविड-19 के कारण होंगे शामिल।

 

 

कर्नाटक में स्टेट फेस्टिवल के नाम से जाना जाने वाला दशहरा इस बार बड़ी ही सादगी के साथ 300 लोग मनाएंगे। कोविड महामारी के पूर्व उस क्षेत्र से ही दशहरा मनाने लोग नही बल्कि टूरिस्ट भीें दूर-दूर से आते हैं। परंतु कोविड-19 के कारण इस बार 5 फीसद बुकिंग भी नहीं हूइ है।

 

जानें मैसूर के दशहरे को विस्तार में।

यहां पर 1 दिन नहीं बल्कि 10 दिन दशहरा मनाया जाता है। और सबसे खास बात तो यह है कि जम्बो सवारी तथा टॉर्च लाइट परेड इसमें 21 तोपों की सलामी के साथ महल से हाथियों का जुलूस भी निकाला जाता है जो कि बेहद लोगों को आकर्षित करता है।
इस जुलूस में निकाले गए हाथियों में से एक हाथी ऐसा होता है जो कि कुछ अलग ही तरह से सजाया जाता है जिस पर 750 किलो सोने का एक सिंहासन रहता है। और उसपर चामुंडेश्वरी देवी की मूर्ति रखी जाती है। यहां पर भिन्न-भिन्न जनपद की झांकियां भी निकाली जाती हैं। इस हाथियों के समूह को लाखों तादाद में लोग देखने के लिए जमा होते हैं। इसे मैसूर के शाही राज महल से निकाला जाता है
नवरात्रि के मौके पर राजा का यहां पर खास दरबार सजाया जाता है। साथ ही मैसूर के राजा वर्तमान समय में भी (यदुवीर कृष्णदत्ता चामराजा वाडियार) सोने के सिंहासन पर बैठते हैं। और
आंकड़ों के मुताबिक यहां पर जो मजमा होता है वह 10 लाख का हमेशा होता आया है। परंतु इसबार कोवीड-19 के कारण सिर्फ 300 लोग ही होंगे, इसमें इस बार झांकी नहीं होगी ना ही कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे और बाहरी व्यक्ति को दरबार में आने पर पाबंदी भी लगा दी गई है।

 

 

आइए जानें कुछ खास बातें ।

स्टेट फेस्टिवल का नाम वाडयार राजा के शासनकाल में , दिया गया था। यह शासनकाल तकरीबन 150 साल तक के कर्नाटका में रहा।
लोगों का मानना है कि मैसूर दशहरे का प्रारंभ 15 वी शताब्दी में विजयनगर नगर के शासकों के द्वारा किया गया था। परंतु भूतकाल में जाकर जब देखा गया तो , एक और पुराने सच ने इतिहास के पन्नों को पलटने पर मजबूर कर दिया । और पता चला कि स्टेट फेस्टिवल का नाम विजयनगर नगर के शासकों के द्वारा नहीं बल्कि वाडयार राजा के शासनकाल में नाम दिया गया था,
आजादी के पश्चात राज्य सरकार ने भी इस मेले को जारी रखने पर किसी भी प्रकार की आपत्ति ना जताई। और यह क्रम आज भी जारी है।

17 अक्टूबर से 1 नवंबर तक राज्य सरकार ने मैसूर के संक्रमण के खतरे को देखते हुए आसपास के सभी पर्यटक स्थलों को बंद रखने का निर्णय दिया था। परंतु टूर गाइड्स तथा होटल एसोसिएशन ने स्थलों के बंद करने के निर्णय से परेशान होकर सीएम गुहार लगाई तो इस फैसले को रद्द कर दिया गया।
मैसूर के होटल ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री नारायण गौड़ा से बातचीत करने के दौरान पता चला कि राज्य सरकार ने अनलॉक के पश्चात पर्यटक स्थलों को खोलने का निर्देश दिया था। तो लगा कोविड-19 के दौरान जो भी नुकसान हुआ है उसकी भरपाई थोड़ी सी दशहरे के मेले से हो जाएगी लेकिन सरकार की तरफ से लगाई गई पाबंदियों ने होटल मालिकों की उम्मीद तोड़ दि।। पहले से ही शहर में 100 से ज्यादा होटल लॉज और रेस्टोरेंट बंद किए जा चुके हैं।
कर्नाटका निजी टैक्सी एसोसिएशन के महासचिव राधा कृष्ण होल्लाह ने भी इस बात की जानकारी दी कि प्रत्येक वर्ष में शुरू दशहरा के चलने पर हमारे पास टैक्सी की बेइंतेहा कमी पड़ जाती थी, परंतु इस बार 5 परसेंट बुकिंग भी ना आई।

महल की सजावट।

मैसूर दशहरे पर महल की सजावट देखने वाली हर वर्ष होती है और महल को हजारों बल्ब से सजाया जाता है।
जिस बल्ब से सजाया जाता है उस बल्ब कंपनी ने अपना कारोबार बंद कर दिया है, लेकिन सिर्फ मैसूर राजमहल के लिए अभी भी यह कंपनी बल्ब बनाती है। जिससे कि महल की रौनक देखने वाली होती है और महल अत्यधिक आकर्षित लगता है। आम जनता के लिए महल का एक हिस्सा पूरे वर्ष में केवल एक बार ही खोला जाता है जगह-जगह हरि काथे कमसाले पाडा गमका यक्षगाना और कठपुतलियों का प्रदर्शन होता है।

 

राज्य के मुख्यमंत्री नंदी द्वार की करेंगे पूजा।

जंबो सवारी का मुहूर्त दोपहर
2:05 से 2:52 मिनट पर 26 अक्टूबर को रखा गया है।
हमेशा की तरह राज्य के मुख्यमंत्री पहले राज महल में नंदी द्वार की पूजा करेंगे। तत्पश्चात मैसूर के महाराज यदुवीर कृष्णदत्ता चामराजा वाडियार के साथ मिलकर हाथी के पीठ पर सोने के सिंहासन में सजी मां चामुंडेश्वरी की प्रतिमा की पूजा करेंगे। फिर जंबो सवारी को सवार करेंगे।

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